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देवसोमनाथ का मंदिर अपनी वास्तुकला की विशेष शैली के लिए प्रसिद्ध है। ऐतिहासिक धरोहर के रूप में मंदिर की यह संरचना डूंगरपुर शहर से लगभग 20 किमी की दूरी पर है।

देवसोमनाथ मंदिर का निर्माण सफेद पत्थर से किया गया है। इसमें 3 निकास हैं, जो पूर्व, उत्तर और दक्षिण की ओर हैं। इसका प्रवेश द्वार दो मंजिला हैं। मंदिर के गर्भगृह में एक ऊंचा गुंबद है। और मंदिर के सामने एक सभा मंडप है जिसे 8 राजसी स्तंभों पर बनाया गया है।

इस मंदिर को देवसोमनाथ का मंदिर कहे जाने के पीछे का एक कारण यह भी है कि लोगों की मान्यता अनुसार है यह गुजरात के वास्तविक सोमनाथ मंदिर से लगभग 600 किलोमीटर की दूरी पर है। मुगल काल के दौरान बार बार होने वाले आक्रमणों के कारण सौराष्ट्र के उसी मंदिर की प्रतिकृति के रूप में स्थापित किया था। क्योंकि उन दिनों सौराष्ट्र के सोमनाथ मंदिर पर बार-बार विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों के कारण उसमें पूजा-पाठ बाधित होती थी। यह धरोहर भारतीय कला और संस्कृति के लिए यह अमूल्य मंदिर संरचनाओं में से एक कही जा सकती है। इस मंदिर के निर्माण की एक विशेषता यह भी है कि निर्माण में पत्थर की शिलाओं के अलावा अन्य किसी साधन जैसे रेट, गोबर या मिट्टी का प्रयोग नहीं किया गया है, बल्कि शिलाओं को हुक के रूप में एक दुसरे से जोड़ा गया है। यह भी मान्यता है कि यह शिवलिंग पांडवों के द्वारा ही स्थापित किया गया था और जिस स्थान पर या जिस गांव में देवसोमनाथ का यह मंदिर बना हुआ है वह गांव द्वापर युग का है और उस गांव का नाम है देव। पांडवों के हाथ से स्थापित हुए इस शिवलिंग पर समय-समय पर कई राजाओं के द्वारा मंदिर का निर्माण और जिर्णोद्वार करवाया गया।

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